धीरे चलो ! (Dheere Chalo !)

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Society & Culture


दुख के जंगल में फिरते हैं कब से मारे मारे लोग

जो होता है सह लेते हैं कैसे हैं बेचारे लोग


जीवन जीवन हम ने जग में खेल यही होते देखा

धीरे धीरे जीती दुनिया धीरे धीरे हारे लोग



वक़्त सिंघासन पर बैठा है अपने राग सुनाता है

संगत देने को पाते हैं साँसों के उक्तारे लोग


नेकी इक दिन काम आती है हम को क्या समझाते हो

हम ने बे-बस मरते देखे कैसे प्यारे प्यारे लोग


इस नगरी में क्यूँ मिलती है रोटी सपनों के बदले

जिन की नगरी है वो जानें हम ठहरे बंजारे लोग