Society & Culture
जिन्दगी में कई बार ऐसे मोड़ आते हैं, जहाँ कोई अपना, कोई बड़ा, या फिर कोई अनुभव से भरा व्यक्ति हमें टोकता है, समझाता है और कहता है- 'सुन भाई, इसी में है तेरी भलाई' उस पल यह वाक्य अक़्सर हमें कड़वा लगता है।
मन में सवाल उठता है कि- मेरी जिन्दगी है, मेरा फैसला है, फिर कोई मुझे क्यों समझा रहा है या क्यों टोक रहा है ? लेकिन समय बीतने के साथ यही वाक्य अनुभव की सबसे सच्ची आवाज बनकर हमारे सामने खड़ा हो जाता है।
दरअसल, भलाई की भाषा हमेशा मीठी नहीं होती। वह कभी-कभी सख़्त, सीधी और बिना लाग-लपेट के होती है। जो हमें सच में चाहता है, वह हमें खुश रखने से पहले सही रखने की कोशिश करता है। वह जानता है कि तात्कालिक सुख से ज्यादा जरूरी दीर्घकालिक भलाई होती है। यही वजह है कि माता-पिता, शिक्षक या जीवन के अनुभवी लोग हमें वह सलाह देते हैं, जो हमें उस समय तो बोझ लगती है, लेकिन भविष्य में वही ढाल बन जाती है।

