Society & Culture
एक बेटा, जो अपने सौतेले पिता को 'अंकल' कहने में भी कतराता था, कैसे उन्हीं को अपनी सबसे बड़ी ताकत मान बैठा? यह कहानी है एक ऐसे लड़के की, जो माँ के फैसलों और समाज की उम्मीदों के बीच खुद को खो चुका था। रिश्तों की कड़वाहट से शुरू होकर, एक उपन्यास के समर्पण तक का यह सफर भावुक कर देने वाला है। क्या आपने कभी अपने 'पापा' को सही मायने में पहचाना है? सुनिए यह विशेष कहानी- 'पहचान'।

