mix 20260413142804

Share:

KUCH BAATEIN

Society & Culture


वह शहर का लड़का 


क्या हम जी रहे हैं या बस एक मशीन का पुर्जा बनकर रह गए हैं? शशि महाजन की यह कविता 'वह शहर का लड़का' आज के शहरी युवाओं की उस कड़वी सच्चाई को बयां करती है, जहाँ कंक्रीट के जंगलों में प्रकृति और प्रेम की परिभाषा खो गई है। चाय की सुड़कियों और सिगरेट के धुएँ के बीच, क्या वो लड़का कभी समझ पाएगा कि जीवन का असली सौंदर्य क्या है? सुनिए इस कविता का भावपूर्ण पाठ और जुड़िए अपनी ही कहानी से।