Kabir Vani : प्रेम न बारी उपजे, प्रेम न हाट बिकाए

Share:

कबीर वाणी

Kabir Vani : प्रेम न बारी उपजे, प्रेम न हाट बिकाए

Miscellaneous


प्रेम न बारी उपजे, प्रेम न हाट बिकाए । राजा प्रजा जो ही रुचे, सिस दे ही ले जाए ।  कबीर दास जी कहते हैं कि प्रेम कहीं खेतों में नहीं उगता और नाही प्रेम कहीं बाजार में बिकता है। जिसको प्रेम चाहिए उसे अपना शीशक्रोध, काम, इच्छा, भय त्यागना होगा।